जीवन में सबसे बेहतरीन चीज क्या है.जानिये पढिये और समझने की कोशिश करें

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मरने की क्रिया मुझे सबसे ज्यादा अपनी लगती है| जीना जैसे बस अपना कार्यकाल पूरा करना| यदा-कदा सोचती हूँ कि कितना अच्छा हो फास्ट फॉरवर्ड में जीवन बीत जाए और फटाफट अंत आ जाये| समझ गई कि जिम्मेदारियाँ निभाए बिना मरना भी अफोर्ड नहीं कर सकते ❤️

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मुझे याद है कि जब हम छोटे थे, तब पापा बताते थे कि बाबा की डेथ के बाद वो तीन दिन तक सारे काम और रिश्तेदारों को निपटाने में लगे रहे थे।
तीन दिन बाद जब घर में कोई न था; तब उनके आंसू निकले थे। जब रोये तो किसी के चुप कराए न चुप हुए।

ये सुनकर ही मैं रोने लगे गया था। बाबा को मैंने तब देखा था जब मैं कुल दो साल का था और बाबा अस्सी के ऊपर थे।

बाबा का जाना किसी के लिए आश्चर्य की बात नहीं थी।वो उम्र ही थी चल गुज़रने की। पापा और बाबा की बातें अक्सर ‘अंत’ को लेकर होती थीं। सब प्रेडिक्टेबल था फिर भी पापा हैरान थे। हतप्रभ थे कि अब उनके पास कोई ऐसा नहीं होगा जिसे वो अपने मन की बात बता दें।

गुलज़ार साहब की उम्र पक चुकी है। उन्होंने अपने कई करीबियों को गुज़रते देखा है।
वो कहते हैं कि सबकी शक्लें उपलों जैसी हैं। जब पंचम दा गुज़रे तो उन्होंने अनायास ही कहा था कि एक और उपला चूल्हे में चला गया।

ये साल मेरे कुछ दोस्तों पर, मेरे जानने वालों मेरे चाहने वालों पर बहुत भारी गुज़रा है। कई चेहरे उपलों की सूरत में चूल्हे में समाहित हो गए।

पहला हादसा मेरे ऑफिस कलीग और दोस्त के साथ हुआ। वो अपने परिवार के साथ अपने गांव से ज़मीन खरीद/बेचकर दिल्ली लौट रहा था कि एक भैंसा गाड़ी उसकी गाड़ी से टकरा गई। वो चार लोग थे, जिनमें एक इतने बूढ़े थे कि दो ऑपरेशन्स के बाद भी उम्मीद नहीं थी कि बच पायेंगे। लेकिन बच गए, मेरा दोस्त गाड़ी से बाहर निकला, थोड़ी दूर चला और बस…. ख़त्म। 23 साल की उम्र में वो अस्सी साल के आदमी को ज़िन्दगी दे गया।

दूसरा हादसा मेरी दोस्त के छोटे भाई सरीखे दोस्त के साथ हुआ। न जाने उसपर कैसा काल आया था कि वो जहां से सब निकल चुके थे, वो वहीं खड़ा रहा और दीवार उसके ऊपर गिर गयी। 16 साल की उम्र में वो सबको ज़िन्दगी दे गया।

तीसरा हादसा मेरे बड़े भाई, मेरे दोस्त, एक मेंटर और मुझ जैसे सैकड़ों लोगों के गुरु के साथ हुआ। उनकी वाइफ की तबियत ख़राब थी। वो अगले दिन हॉस्पिटल ले गए, उसी दिन पता चला कि डेंगू हुआ है। उसी शाम वो चल बसी। सब इतनी जल्दी हुआ मानों ऊपर वाले ने पलकें झपकाई हों। चलती हुई खुद हॉस्पिटल गयीं और….

जिस आदमी में दुनिया भर को संभालने की कूवत हो, उसे टूटता देखना बहुत बहुत कष्टकारी होता है।

जब कोई क़रीबी अकस्मात चला जाता है तब हमें उसके जाने का जितना दुःख होता है उतना ही अफ़सोस इस बात का भी होता है कि हम क्यों रह गए?

मन में सवाल बजने लगते हैं कि हम कब तक हैं फिर?

कितना मोल है इस ज़िन्दगी का?

हम कैसे पीछे रहेंगे उसके बिना जिसकी सूरत देखकर तो दिन शुरु करते थे?

ये सारे जवाब ज़हन में घण्टियों की तरह बजते हैं।

लेकिन जो बहुत क़रीबी न होकर जानकर होता है, उसके मन पर दो रिएक्शन होते हैं, वो हद से ज़्यादा सचेत हो जाता है। अपने से ज़्यादा अपनों के चले जाने का भय उसपर हावी होने लग जाता है या वो निर्विकार हो जाते हैं।
ये मान लेते हैं कि ज़िन्दगी की फ्लाइट में हम पैसेंजर हैं पायलट नहीं, हमें ये जर्नी पूरी करनी है। बस।

तो क्या वो हर इच्छा/ज़िम्मेदारी से बच निकलें?
शायद नहीं! लेकिन अब वो कम से कम हर चिंता से मुक्त तो रहें। न रह सकें तो कोशिश जरूर करें।

मुझे ऐसे में कृष्ण याद आते हैं। अपने प्रियजनों के बीच युद्ध का अपयश लेने के बाद जब सब चले गए तब कृष्ण बचे रहे। कृष्ण ठीक जानते थे कि परिणाम क्या होना है, पर उन्होंने खुद को मिली ज़िम्मेदारी निभाने में कोई कोताही नहीं की। वो भीषण युद्ध निपटने के बाद वो कृष्ण ही थे जिनके पास सिवाए अवसाद के कुछ नहीं बचना था पर उन्होंने अवसाद को भी खुद पर हावी नहीं होने दिया।

उन्होंने सिखाया कि चले जाने से मुश्किल है अपनों को जाते हुए देखना और खुद रह जाना।

हम क्यों रह गए हैं यहां पर ज़रा सोचिए कभी।

शायद इसलिए कि हमें मिली जिम्मेदारियां अभी पूरी होनी बाकी हैं।

हमारा सफ़र अभी बाकी है। हमारी ज़िंदगी अभी बाकी है और हमें ये सोचकर रोज़ मरना नहीं है कि हम एक दिन मर जाएंगे, बल्कि यही सोचकर जीना है कि एक दिन तो हमें मरना ही है… तो बस उस एक ही दिन मरेंगे।

तबतक जीना ही है। जिंदादिल लिए। अपने सफ़र की जिम्मेदारियों को निभाते हुए। मुस्कुराते हुए।

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