तो क्या देश में सवर्ण कहने वाली जातियों की पहचान संकट में है ? क्या अब दलितों से उनको खतरा है –

ab latest

यह वीडियो डूंगरपुर में अभी हाल ही में शिक्षक भर्ती को लेकर हुए उपद्रव के दौरान का बताते हैं । जो कि सोशल मीडिया पर काफी प्रसारित है।
दोस्तों, इस वीडियो को देखकर बहुत समय पहले का एक वाकया याद आ गया है। मैं जयपुर के पास में ही कही एसएचओ के पद पर पदस्थापित था। तब वहां पर जयपुर के एक नामी-गिरामी डॉक्टर साहब की पुश्तैनी जमीन पर बांटे में खेती करने वाले लोगों ने ही काफी समय पहले से कब्जा जमा लिया था। डॉक्टर साहब बड़े दुखी थे, बड़े सिफारिश भी थे, परंतु पार पड़ नहीं रही थी ।
तब मैंने उनको कहा कि डॉक्टर साहब राजस्थान में कहावत है कि “जर-जमीन जोर की, जोर मिटे ओर की” तो आप जब तक मौके पर आकर खुद संघर्ष नहीं करोगे, तब तक जमीन को वापस हासिल करने की बात को भूल जाओ।
डॉक्टर साहब ने मेरी राय मानी और धीरे-धीरे अपनी पुश्तैनी जमीन को कब्जाधारी भूमाफिया से कानूनन तरीके से छुड़वाया।
उस दौरान डॉक्टर साहब एक बात बताते थे कि, साहब मुझे इस देश में जनरल कास्ट का भविष्य नजर आ रहा है।
कुछ सालों बाद सड़कों पर एक भीड़ निकलेगी और वह कहेगी कि हम हैं “मूल भारतीय” और यह जो सवर्ण जाति के लोग हैं, यह विदेशी हैं । यह नारा देते हुए भीड़ घरों में घुस जाएगी, लूटपाट करेगी, बहन बेटियों को उठा ले जाएगी, वह दिन दूर नहीं है । इससे पहले- पहले अपने बच्चों को विदेश में सेट करने का काम करो। ताकि मौका मिलने पर भाग छूटो क्योंकि “जान रहे तो जहान रहे”।
डॉक्टर की वह बात अब धीरे-धीरे सत्य प्रतीत हो रही है, क्योंकि कुछ समय पूर्व एक अन्य जाति के आरक्षण आंदोलन को भी मैंने देखा भी था और बंसल आयोग के तौर पर स्वयं भुगता भी था । राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले उस हिंसक आंदोलन को तत्समय सुप्रीम कोर्ट ने “राष्ट्रीय शर्म” भी कहा था।
तब भी मुकदमे वापस हो गए थे, अब भी वैसा ही कुछ होगा ‌।
कबूतर की तरह आंख बंद कर, समस्या का क्षणिक समाधान निकालने की भावना से परे जाकर जब तक स्थाई समाधान नहीं निकलेगा । तब तक ऐसे जातीय विद्वेष से भरे आंदोलन देश के सद्भाव और भाईचारे को तार-तार करते रहेंगे। समय रहते यदि नहीं चेते, तो देश के बड़े अहित को कोई नहीं रोक पाएगा ।
खुद की जाति का भला कीजिए, कोई नहीं रोकता। परंतु दूसरी जाति को गालियां देना, उसके महापुरुषों को गालियां देना । कैसी नैतिकता और शिष्टाचार की बानगी है ?
आज अभिव्यक्ति की आजादी अपनी सीमाओं को लांघ चुकी है, फर्स्टेड लोग राम, कृष्ण हनुमान और दुर्गा तक को भी नहीं बख्स रहे है। ऐतिहासिक पुरुषों का अपमान तो जैसे आम शगल बन चुका है।
यह जो वीडियो है, इसमें जो भी आने वाला भविष्य का शिक्षक है। वैसे निश्चित तौर पर यह शिक्षक बनेगा ही और फिर यह क्लेम भी करेगा कि “महाराणा प्रताप, दुर्गादास राठौड़, पृथ्वीराज चौहान, मिहिर भोज, राव हमीर सब हमारे ही थे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *