वो कमरा जिसने उसके पापो की सजा खुद ही दे दी थी

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बूढ़ी नानी का घर एक लम्बी बंद गली के अंत में है| पुराने घरों के डिजाइन में नया घर| आगे का हिस्सा आजकल के फ्लैट जैसा| पर कमरे बड़े-बड़े| बड़ा बरामदा| चौकोर| घने मनीप्लांट के लत्तड़ से ढका-छुपा सा| चौकोर गमलों सी क्यारियों में पेड़ों जैसे मोटे मनीप्लांट के तने/लत|

सामने लकड़ी की कुर्सी पर बूढ़े नाना बैठे होते| 90 से ऊपर के होंगे| काले चमड़े का जूता पहने| रीढ़ की हड्डी सीधी| ऊँचा सुनते थे| पर बात उन्हें सब से करना होता था| आप सामने से घुसे कि उन्होंने कोई प्रश्न किया| आपने उत्तर दिया| उन्होंने फिर पूछा| आपने जोर से उत्तर दोहराया| उन्होंने धीरे से कहा-क्या?अब चीख-चीख कर आपको बोलना है|

मैं तो बच्ची हूँ तो ज्यादा समस्या नहीं परन्तु चूँकि आप बड़े हैं और खड़े हैं तो झुक कर उनके कान के नजदीक मुँह ले जाकर चीखना है| नाना हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक के पद से रिटायर हुए हैं| उनके प्रश्न इस इतवार के रामायण धारावाहिक से भी हो सकते हैं या आज के समाचारपत्र के मुखपृष्ठ से भी|

कभी मन हुआ तो चलो अखबार पढ़ के सुनाओ! चलिए, पूरा मोहल्ला खबरों को सुनेगा| आप चिल्ला-चिल्ला के पढ़िए!

फिर नाना उठ कर अंदर जायेंगे| दोनों पांव साथ चलेंगे और एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे| पांव उठा नहीं सकते सो दोनों पैर जमीन पर रगड़ कर शनैः शनैः बढ़ते हुए पाँच मिनट में अंदर वाले बरामदे पर पहुंचेंगे| बरामदे के बाद विशाल आँगन|

एक ओर चापाकल| एक ओर सप्लाई वाला नल| बीच में तुलसीचौरा| उससे सटे सिलबट्टा| काले पत्थर का| गोल, सुडौल लोढ़ी| चौड़ी, बीच में थोड़ी गहरी पाटी| उसपर दोनों समय हल्दी-मसाला पीसती बूढ़ी नानी|

नाना से दो-चार साल तो छोटी होंगी ही| तो सुनने में समस्या नहीं उनको| चलने में भी नहीं| अपना और नाना का काम आराम से करती हैं| सब काम निबटा के दोपहर में रामायण भी पढ़ लेती हैं|

टीवी चलता रहे तो हाथ में भरा हुआ पीतल का लोटा लिए खड़ी रहेंगी| बैठेंगी नहीं| पर सिनेमा देखेंगी| जब हीरो-हीरोइन का सीन आएगा तो-
“जा हथवा पकड़ लेलकै!
लै! अब की होते!
हे राम! इ त चुम्मा ले लेलकै!
इ ल! कथी-कथी के परचार है” वाली लाइव कमेंट्री चालू रहेगी|

इतने पर तो फिर भी ठीक ही है पर रात के साढ़े नौ बजे के बाद नानी जब अपना डेन्चर खोल के अचानक से अपने पोपले मुँह से हाफुस-हाफुस कर के बोलने लगती है तो मुँह पर आँचल रखने के उनके सारे प्रयास निष्फल सिद्ध हो जाते हैं|

इसी लम्बी गली के बीच में एक पीला मकान है| दो मंजिला| बड़ा सा अहाता| ऊँची चहारदीवारी| दो-चार नारियल के पेड़| एक कमरा हरे-भरे अहाते में भी| पूरे मकान से अलग| बाहर-बाहर| इसकी खिड़की गली में खुलती है| दिन में जब भी गुजरो एक आदमी खिड़की पर ही बैठा होता है| हर आने-जाने वाले को पुकार के बात करना चाहता है|

ए लड़की! तुम्हारा नाम क्या है?

मैं भागती हूँ|

कई दिन, कई बार ये होता है| मैं बार-बार भागती हूँ| पर अभी तक घर में किसी को कुछ बताया नहीं है मैंने|

एक दिन देखती हूँ कि वह आदमी किसी को पुकार रहा है| ए चचा, ए चचा सुनिए न चचा! दू मिनट बात कीजिये न! किसी से बात करने का बहुत मन होता है|

आज उस आदमी की नजर मुझ पर नहीं पड़ी है| पर मैं देख रही हूँ| हाँ! हाँ! करके पीछा छुड़ा के जाते हुए उन बूढ़े आदमी और खिड़की पर बैठे हुए यंग आदमी की मुखमुद्रा|

आज मुझे अच्छा नहीं लगा| तरस सा आ रहा है| क्या हो जाता जो वो थोड़ी देर बात कर ही लेते! ऐसा व्यवहार क्यों किया उन्होंने? बेचारे का मुँह कैसा बन गया| रोने-रोने| पर हुआ क्या है आखिर? ये आदमी खिड़की पर ही बैठा क्यों रहता है? इसके घर का कोई इसके पास क्यों नहीं रहता? मोहल्ले का कोई भी इससे बात क्यों नहीं करना चाहता?

मेरा बालमन द्रवित है| अब मुझसे मेरा नाम पूछेंगे तो मैं बता दूंगी| बात कर लूंगी| मैंने निश्चय कर लिया है|

कुछ दिनों से खिड़की बंद दिख रही है| मैं गेट से झांकती हूँ| हमेशा की तरह सुनसान मकान| कुछ दिन मेरे मन में रही है बात फिर भूल-भाल गई हूँ|

एक सुबह उठी तो गोपाल भईया बूढ़े नाना को चिल्ला-चिल्ला के सुना रहे हैं-

“उ लड़का को बंदर का कमर लगाया हुआ था| फिर दोबारा दूसरे साइड का ऑपरेशन करना था| लेकिन कल मर गया| राता-राती सब ले गया| मोहल्ला वाला कोई नहीं गया|”

नाना क्या…. क्या…. कर रहे हैं|

ACID नहीं पहचानती थी मैं| पर मुझे दो-चार दिनों में टुकड़ों में सुनने में आया कि सालों पहले किसी लड़की के घर घुसकर उसके चेहरे पर एसिड फेंका था उसने| लोग पकड़ने दौड़े तो छत से कूदकर भागना चाहा| कमर के बल गिरा और कमर टूट गई| तब से कभी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाया|

लड़की के बारे में या उस पापी के कानूनी सजा के बारे में कुछ पता नहीं और दैवीय एवं सामजिक न्याय भी कहाँ समझ पाई थी!!

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