कैसे हिन्दुइस्तन को उर्दुस्तान और इस्लामीकरण किया गया,जानिये उसका ये छोटा सा उदाहरण

Ab politics

डॉ फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध जारी है। यह नियुक्ति पैसों और नेक्सस के सिवाय और किसी आधार पर नहीं हुई है। पैसों के लालची साहित्य विभागाध्यक्ष ने अपने 5 साल पुराने विश्वसनीय स्टूडेंट को पैसे लेकर नियुक्त किया है, बस इतनी सी बात है। इस बात की विश्वविद्यालय प्रशासन से इतर किसी स्वतंत्र संस्था से जाँच होनी चाहिये, कच्चा चिट्ठा खुल जायेगा। फ़िरोज खान के मुसलमान होने का उन्हें कोई नुकसान नहीं है, बल्कि फायदा ही है। कुछ लोग मालवीय मूल्यों, संविधान और मुसलमान होने की बात को लेकर अधिक भ्रमित हैं।

खैर, किसी भी संस्था की स्थापना के पीछे उसके संस्थापक का एक उद्देश्य होता है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ‘हिन्दू’ शब्द और संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के ‘धर्म’ शब्द में संस्थापक की बहुत सारी अवधारणाएं निहित हैं। हमारी परम्परा नामकरण संस्कार करने की रही है, और हम सबसे सार्थक नाम चुनने की कोशिश करते हैं, यह समझना चाहिये।

एक घर बनाने में जब हम सबकी जिंदगी खप जाती है। तब संसाधन-विहीन एक व्यक्ति मदन मोहन मालवीय ने आज के एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय की नींव रखी। भीख मांगकर 40 हजार लोगों के पढ़ने और रहने की जगह बनाई। जब भारत में ब्रिटिश शासन अंग्रेजी मूल्यों वाली शिक्षा को मानक शिक्षा के तौर पर स्थापित कर रही थी तब उन्होंने ‘हिन्दू’ मूल्यों के संरक्षण के लिये एक विश्वविद्यालय की परिकल्पना की थी। महात्मा गांधी ने उन्हें ‘महामना’ कहा। आज संविधान में स्पष्ट निर्देश न होने का बहाना कर के उनके मूल्यों की जो अनदेखी की गई है, वह मर्माहत करने वाला है।

मालवीय जी का 1946 में गुलाम भारत में महाप्रयाण हुआ और वे संविधान-निर्माण का हिस्सा नहीं रहे। लेकिन उनके विचार जीवित हैं और आज भी उतने ही प्रासंगिक है, जितने तब थे। विश्वविद्यालय के दीवारों और पत्थरों पर उनके संदेश पढ़ते हुए हम जवान हुए हैं। हिन्दू विश्वविद्यालय के हम जैसे छात्र उन विचारों को आत्मसात् करने की कोशिश की करते हैं। विश्वविद्यालय की दीवारों पर वेदों उपनिषदों के मन्त्र पढ़े हैं। विश्वनाथ मंदिर में खुदे 18 अध्याय गीता को देखकर नतमस्तक हुए हैं। हिन्दू मूल्यों के संरक्षण में मालवीय जी जैसा बनने का सपना देखा है। हमेशा आदर्श माना है। जो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में नहीं पढ़ा है, या पढ़कर भी श्रद्धाविहीन हैं, हम उनसे इस आस्था की उम्मीद बिल्कुल नहीं करते। उनकी धर्म-निरपेक्षता ईमानदार है। लेकिन जो लोग इस आस्था से जुड़े हैं, उनका चुप रहना जरूर अखरता है।

हिन्दू सन्दर्भ में मालवीय मूल्य क्या हैं इसकी बानगी बस इससे समझ लीजिये कि 1906 में ‘मुस्लिम लीग’ की स्थापना और मुसलमानों के अनावश्यक मांगों को देखकर 1915 में
महामना मालवीय कांग्रेस में अपनी ऊँची साख होने के बावजूद कांग्रेस से अलग हुए और हिन्दू-हित की बात के लिये 1915 में ‘अखिल भारतीय हिन्दू महासभा’ की स्थापना की। अपने जीवनकाल में 4 बार कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष रहे, जिसमें से दो अधिवेशनों के समय जेल में रहे। जब ब्रिटिश हुकूमत में कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने 1916 के ‘लखनऊ पैक्ट’ के तहत मुसलमानों के लिये अतिरिक्त एवं पृथक् प्रतिनिधित्व की बात की, तब मालवीय जी ने कांग्रेस के इस प्रस्ताव का तीखा प्रतिरोध किया। आज वही प्रतिरोध कहीं न कहीं धर्म संकाय के छात्र कर रहे हैं।

विनायक दामोदर सावरकर और डॉ केशव बलिराम हेडगवार इस हिन्दू महासभा का अहम हिस्सा रहे। बाद में इस संस्था से हिन्दुत्व-बीज को लेकर डॉ हेडगेवार ने हिन्दू महासभा से इतर एक संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की। आज उस ‘हिन्दुत्व’ मूल वाले ‘संघ’ के पदाधिकारी जब एक ‘हिन्दू’ विश्वविद्यालय के कुलपति पद के लिये राकेश भटनागर जैसे एक नास्तिक या धार्मिक रूप से तटस्थ व्यक्ति की सिफारिश करते हैं तो हृदय असीम वेदना से भर जाता है।

जो उदारवादी लोग हैं उनकी उदारवादिता वस्तुतः अदूरदर्शिता है। बनारस में संस्कृत श्लोक बच्चा बच्चा पढ़ता है और उसे कभी किसी मुसलमान से पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ी। जब पण्डितराज जगन्नाथ शाहजहाँ की पुत्री लवंगी से विवाह करके दिल्ली से बनारस आये और विद्वत्-सभा में जाने की कोशिश की तब उन्हें ‘यवनीसंसर्गदूषित’ कहकर संस्कृत-विद्या के अपय्य दीक्षित जैसे दृढ़ धार्मिक आचार्योंं ने बहिष्कार किया, और उनकी सारी विद्वत्ता प्रतिपादित करते रहने के बावजूद नहीं अपनाया। मालवीय जी ने ‘हिन्दू विश्वविद्यालय’ और ‘धर्म विज्ञान संकाय’ के लिये बनारस को यूँ ही नहीं चुना था। उन्हें पता था धर्म की दृढ़ता बनारस में है। आज के आचार्य अपनी धार्मिक दृढ़ता को गिरवी रख चुके हैं। उनकी चुप्पी बनारस को सदियों तक सालती रहेगी। महामना का कहना था कि मुझे मोक्ष नहीं चाहिये। मेरी आत्मा यहीं विश्वविद्यालय में मौजूद रहेगी। अगर ऐसा है तो संकाय के जिम्मेदार आचार्यों को देखकर उनकी आत्मा बहुत ग्लानि महसूस कर रही होगी।

इस घटनाक्रम और आंदोलन की एक बात इतिहास में दर्ज होनी चाहिये। हिन्दू धर्म संकाय के साहित्य विभाग के एक OBC पद हेतु 27 अभ्यर्थियों ने आवेदन किया। 26 हिन्दू OBC थे – यादव, पटेल, चौधरी, सिंह आदि आदि। एक मुसलमान OBC था – खान। और हिन्दू विश्वविद्यालय के नास्तिक कुलपति और भ्रष्ट साहित्य विभागाध्यक्ष और उनके गैंग ने मुसलमान OBC को ज्यादे योग्य माना। 26 OBC हिन्दू मूर्ख साबित किये गए। और OBC-SC/ST के हक़ के लिए लड़ने वाले प्रोपोगंडावादी झुण्ड ने एक स्वर में मुसलमान का धर्म देखकर 26 हिन्दू OBC को लात मार दिया। दूसरी ओर उन 26 OBCs के हक़ के लिये और उनको योग्य सिद्ध करने के लिये ‘संकीर्ण मानसिकता’ की उलाहना लिये ‘हिन्दू’ एक ‘हारी हुई लड़ाई’ भजन कीर्तन गाते हुए दम भर लड़ते रहे।

धरने पर बैठे साथियों! आप धर्मयोद्धा हैं। संस्कृत पढ़ने पढ़ाने का मसला है ही नहीं, आज की चिन्ता भी नहीं है। लेकिन जब 20 साल बाद ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ में वैदिक मंगलाचरण की जगह कुरान और हदीस की आयतें गूंजेंगी, विश्व हिन्दू पंचांग की जगह कुरान और बाइबिल का प्रकाशन होगा, तो बुढ़ापे में आपको कुण्ठा की जगह एक सन्तोष का अनुभव होगा कि जब संविधान की कोई एक पंक्ति आपके पक्ष में नहीं थी, एक ढंग का तर्क आपके पास नहीं था, महामना के नाम पर जीवनयापन करने वाले अधमर्ण मौन थे, तब भावनाओं के बल पर, अन्तरात्मा की आवाज पर, महामना के आदर्शों और मूल्यों की रक्षा के लिये पुलिस की लाठी खाने और खून का कतरा गिरने तक हम निहत्थे एक धर्मयुद्ध लड़ते रहे थे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *