बाल विवाह पर बने कानून और अदालतों का बेहूदीभरा रवैया

Ab politics

करीब 100 साल पहले की बात है। गांधीजी ने कांग्रेस के अधिवेशन में भाषण देते हुए कहा था कि एक राष्ट्र में एक ही राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। और यह भाषा हिन्दी हो सकती है। तब राष्ट्रवाद की भावना इतनी प्रबल थी कि लोग-बाग जोश में भर कर हिन्दी सीखने-सिखाने निकल पड़े।

नतीजा ये हुआ कि अगले अधिवेशन में दक्षिण भारतीय लोग भी शुद्ध हिन्दी में भाषण देते पाये गए। हिन्दी बोलने में सक्षम हो गए।

पर लगभग 30 साल बाद जब उसी कांग्रेस सरकार के द्वारा जब दक्षिण में हिन्दी थोपने की कोशिश की गई हिंसा, तोड़फोड़, विरोध शुरू हो गया। लोगों ने जम कर हिन्दीविरोध करना शुरू कर दिया। जिस कांग्रेस के आह्वान पर लोगों ने हिन्दी को सिरमाथे बिठाया गया था, आज उसी कांग्रेस की करनी के कारण दक्षिण भारत मे हिन्दी विरोधी बेल्ट तैयार हो गया है। और यह स्थिति पिछले 70 साल में भी नहीं सुधर पाई है।

ऐसे ही माननीय न्यायालय जी जब बाल विवाह की बात करते हैं तो बाल विवाह कानूनी तौर पर मना करते हैं। पर साथ ही ये कह देते हैं कि 18 साल की लड़की यदि दो साल के अंदर-अंदर शादी रद्दीकरण के लिए आगे नहीं आती तो शादी जायज मानी जाएगी। ये कैसी अजीब बात है। जो नाजायज है वो बस इसलिए जायज हो जाता है कि पीड़िता ने गुहार नहीं लगाई! जबकि यहाँ सीधे-सीधे संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों एवं कॉन्ट्रैक्ट एक्ट दोनों का ही उल्लंघन हो जाता है।

वहीं एक तरफ समुदाय विशेष में 15 साल की लड़की का विवाह भी जायज है।

अभी फिर आप अपने कल के फैसले में कह रहे हैं कि 18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ बलात्कार तब तक साबित नहीं होगा जब तक कि पीड़िता पत्नी साल भर के अंदर-अंदर न्यायालय का दरवाजा न खटखटाये। यह भी वही बात है कि जो नाजायज है वो बस इसलिए जायज हो जाता है कि पीड़िता पत्नी ने गुहार नहीं लगाई। सवाल ये उठता है कि आखिर हमारे मौलिक अधिकारों के संरक्षण की जिम्मेदारी किसकी बनती है? माननीय सर्वोच्च न्यायालय को क्या यह संज्ञान लेने की आवश्यकता नहीं?

बिना जागरूकता लाये किसी सामाजिक बुराई को मिटाने का प्रयास निष्फल जाएगा। क्योंकि जब-जब कानून ला कर के खत्म करने की कोशिश की गई असफलता ही हाथ लगी है।

पटाखा भी सामाजिक बुराई है पर जागरूकता का अभाव और ऐसे आधे-अधूरे फैसलों के कारण बनी आपकी छवि ही इस बैन को असफल बनाने का मुख्य कारण बनेगी।

हमारे स्थानीय बाजारों में त्योहारों के मौसम में अत्यंत छोटे व्यवसायी राखी, तीज का डलिया, अनन्त के धागे, जितिया बद्धि, देवी माँ की चूनर, धनतेरस के बर्तन, पटाखे, सजावटी सामान, झालरें, रंगीन कागज, छठ में आम की लकड़ी, मिट्टी के चूल्हे, फल-फूल, अरता, पान-सुपारी बेच कर साल भर की कमाई करते हैं। आप के पटाखे न बेचने के निर्णय से यह वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला है।

पटाखा बन्द करवाने के लिए एक समग्र सोच और स्वच्छ मंशा की जरूरत है। पटाखा उद्योग से जुड़े लोगों के साल भर के रोजगार की बात किये बगैर इस फैसले का हश्र भी वही होने वाला है जो आपके बाकी के फैसलों का होता आया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक नई रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में 13 भारत के शहर हैं। इनमें राजधानी दिल्ली सबसे ऊपर है। इसके बाद पटना, रायपुर और ग्वालियर का नंबर आता है। तो बेहतर होता कि सिर्फ दिल्ली के बजाय पूरे देश के प्रदूषण के लिए चिंतित हुआ जाता। इस बाबत कोई नियमावली या कोई गाइड लाइन तैयार किया जाता।

यह एक अकाट्य सत्य है कि किसी सामाजिक प्रथा, बुराई, अभ्यास को कानून से दबाया, मिटाया नहीं जा सकता। बदला नहीं जा सकता। जबरन थोपा नहीं जा सकता। बल्कि ऐसे फैसले जनता को और उकसाने का काम ही कर जाते हैं।

हालांकि यह ज्यादा बेहतर होता कि ऐसे मामलों में माननीय न्यायालय द्वारा स्थानीय नगर निगम और राज्य सरकारों को निर्देश जारी किया जाता और माननीयों की ऊर्जा बाकी के ठोस विषयों पर हस्तांतरित हो पाती।

देश को अभी मौलिक अधिकारों, स्त्री सशक्तिकरण, पशु अधिकारों जैसे मुद्दों पर एक गम्भीर सोच ओर निर्देश की जरूरत है। ऐसे में देश आधिकारिक फैसलों की बजाय सम्पूर्ण और सशक्त विधायी फैसलों के लिए आपकी ओर उन्मुख है। देश की महती जिम्मेदारी आपपर है और उसका निर्वहन आपका ही कर्तव्य है।

प्रतिबन्ध लगा कर जिन चीजों को रोकने का प्रयास हुआ है, उनमें प्रदूषण फैलाने वाली चीजों में गुटखा और पॉलीथीन प्रमुख हैं। सरकारी आदेशों का उन मामलों में क्या हुआ है उसे एक नजर देखना पटाखा बेचने की पाबन्दी से शायद माननीय की आँखे खोल दे। देश को एक समान और तार्किक फैसले की जरूरत है योर लॉर्डशिप! पता नहीं आप कौन सी दुनिया में रहते हैं !!

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